जालन्धर पंजाब दैनिक न्यूज़ (मुनीष तोखी) प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025 को पूंजी परस्त आर्थिक सुधारों की एक श्रृंखला को मंजूरी दी है. जिसमें बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को 100 प्रतिशत तक बढ़ाने तथा बीमा कानून (संशोधन) विधेयक को स्वीकृति देना शामिल है।इस मौके पर सभा को संबोधित करते हुए मंडत सचिव कामरेड पंकज भारद्वाज ने कहा कि बीमा क्षेत्र का डी.नेशनलाइजेशन वर्ष 1999 में IRDA विधेयक के पारित होने के साथ किया गया था। इसके बाद से विदेशी साझेदारों के साथ अनेक निजी बीमा कंपनियों जीवन और गैर जीवन दोनों क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इन कंपनियों के व्यवसाय संचालन के लिए पूंजी कभी भी बाधा नहीं रही है। वास्तव में, बीमा क्षेत्र में कुल एफडीआई, नियोजित पूंजी का मात्र लगभग 32 प्रतिशत ही है। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा एफडीआई सीमा को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत तक करना और विदेशी पूंजी को भारत में पूर्ण स्वतंत्रता देना पूरी तरह से तर्कहीन है। इस निर्णय के न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था पर, बल्कि भारतीय बीमा कंपनियों पर भी गंभीर दुष्परिणाम पड़ेंगे। इससे मौजूदा कंपनियों के अधिग्रहण हेतु मात्रुतापूर्ण बोलियों (hostile bids) भी लग सकती हैं,AIIEA का हढ़ मत है कि विदेशी पूंजी को पूर्ण स्वतंत्रता और अधिक पहुँच देने से बीमा उद्योग की सुव्यवस्थित वृद्धि अवरूद्ध होगी तथा लोगों और व्यवसायों को आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने के बजाय मुनाफा केंद्रित दृष्टिकोण हावी होगा। इसका भारतीय समाज के वंचित और हाशिये पर खड़े वर्गों के हितों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, विदेशी पूंजी कभी भी घरेलू बचत का विकल्प नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में घरेलू बचत को विदेशी पूंजी के हवाले करना न तो आर्थिक रष्टि से और न ही सामाजिक रष्टि से कोई औचित्य रखता है। भारत एक कल्याणकारी राज्य है और आर्थिक विकास के लिए, जिससे सभी नागरिकों को लाभ पहुँचे, बचत पर राज्य का अधिक नियंत्रण आवश्यक है। कामरेड हरीश कुमार मंडल प्रधान ने सभी साथियों से सांझा किया कि बीमा क्षेत्र में प्रस्तावित पे संशोधन जिनमें बीमा कम्पनियों का गैर-बीमा कम्पनियों के साथ विलय की अनुमति, संसदीय निगरानी से हटकर आई आर. डी.ए. को व्यापक अधिकार देना, मध्यस्थों के लिए एकमुश्त पंजीकरण, विदेशी पुनर्बीमाकर्ताओं (re-insurers) के लिए नेट ओन्ड फंडस (NOF) की सीमा को वर्तमान 5,000 करोड़ रुपए से घटाकर 1,000 करोड़ रुपए करना आदि शामिल है पह कदम देश को 1956 से पूर्व की उस स्थिति में वापस से जाएँगे, जिसने जीवन बीमा व्यवसाय के राष्ट्रीयकरण के लिए सरकार को बाध्य किया था।कामरेड वेद कुमार, उप प्रधान पेंशन एसोसिएशन जालंधर ने बताया कि AIIEA बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा बढ़ाने के इस निर्णय के विरुद्ध अपना कड़ा विरोध दर्ज कराता है और इस कदम को तत्काल वापस लेने की माँग करता है। साथ ही संघ सरकार को बीमा कानूनों बीमा अधिनियम, 1938: एल.आई.सी. अधिनियम, 1956 तथा आई०आर०डी०ए० अधिनियम 1999 में प्रतिगामी संशोधनों के प्रस्ताव के प्रति आगाह करता है। AIIEA की माँग है कि आर्थिक नीतियों को कार्पोरेट परस्त झुकाव से हटा कर जनोन्मुखी दिशा में पुनर्सरखित किया जाए। सरकार को कार्पोरेट मुनाफे से ऊपर जनता के हितों को रखना चाहिए। अखिल भारतीय बीमा कर्मचारी संघ (AIIEA) इस निर्णय की कड़ी निंदा करता है और इसके विरुद्ध जनमत को संगठित करना निरंतर जारी रखेगा। इस सभा को उपरोक्त के अलावा कामरेड परवीन कुमार, कामरेड तजिन्दर कौर, कामरेड अशोक कुमार, एवं कामरेड रजनीश सहगत ने भी सम्बोधित किया।